दरभा, बास्तानार और तोकापाल में बिखरी लोक-संस्कृति की छटा; सांसद और विधायकों ने दिया जड़ों से जुड़ने का संदेश
रिपोर्ट: ओम साहू
जगदलपुर, 16 जनवरी 2026/ बस्तर अंचल की आदिम संस्कृति, पारंपरिक खान-पान और रीति-रिवाजों को वैश्विक पटल पर पहचान दिलाने के उद्देश्य से जिले के विभिन्न विकासखंडों में ‘बस्तर पण्डुम’ का भव्य आयोजन किया गया। दरभा विकासखंड के छिन्दावाड़ा, बास्तानार के बड़े किलेपाल और तोकापाल के छोटे आरापुर में आयोजित इस सांस्कृतिक महोत्सव में जनसैलाब उमड़ पड़ा।
इस अवसर पर जनप्रतिनिधियों ने बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को भावी पीढ़ी तक पहुँचाने का संकल्प दोहराया और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश दिया।
पूर्वजों की धरोहर को सहेजना हमारा दायित्व : सांसद महेश कश्यप
दरभा विकासखंड के छिन्दावाड़ा में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सांसद श्री महेश कश्यप शामिल हुए। उन्होंने कहा कि बस्तर की संस्कृति और परंपराओं को गढ़ने में हमारे पूर्वजों की कई पीढ़ियों का योगदान रहा है। उन्होंने न केवल रीति-रिवाजों को संरक्षित किया, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों की भी रक्षा की।
उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि आज की पीढ़ी अपनी संस्कृति और पारंपरिक खान-पान से दूर होती जा रही है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। अब समय आ गया है कि हम अपनी परंपराओं को अक्षुण्ण रखें और पूर्वजों की धरोहर को सहेजें।
बस्तर पण्डुम से मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान : विधायक विनायक गोयल
चित्रकोट विधायक श्री विनायक गोयल ने कहा कि बस्तर पण्डुम जैसे आयोजनों के माध्यम से यहां की खान-पान संस्कृति और रीति-रिवाज आज दुनिया के सामने आ रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकार ने ऐसा मंच प्रदान किया है, जिससे बस्तर की पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिल रहा है।
हर 10 किलोमीटर में बदलती है बस्तर की पहचान : विधायक किरण सिंह देव
जगदलपुर विधायक श्री किरण सिंह देव ने कहा कि बस्तर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विविधता है। यहां हर 10 किलोमीटर में बोली, भाषा, रहन-सहन और संस्कृति बदल जाती है। उन्होंने बताया कि बस्तर ओलंपिक में 3 लाख 91 हजार पंजीयन इस बात का प्रमाण है कि यहां के युवा आगे बढ़ने को तत्पर हैं।
उन्होंने कहा कि हमें हिंदी और अंग्रेजी सीखनी चाहिए, लेकिन अपनी स्थानीय बोली और भाषा को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। बस्तर की हर वनस्पति औषधीय गुणों से भरपूर है, जिस पर हमें गर्व होना चाहिए।
आस्था, नृत्य और वनों के स्वाद का अनूठा संगम
छिन्दावाड़ा में अतिथियों का स्वागत पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ देवी-देवताओं के आह्वान और माई दंतेश्वरी की पूजा-अर्चना से हुआ। पारंपरिक बाजा-मोहरी और धुरवा नृत्य ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
इस आयोजन में बस्तर के वनों में पाए जाने वाले दुर्लभ कंद-मूल जैसे कोचई, तरगारिया, डेंस, कलमल, पीता, सोरेंदा, जिमी और नागर कांदा प्रदर्शित किए गए। पारंपरिक व्यंजन जोंधरी लाई के लड्डू, जोंधरा, मंडिया, पान बोबो, गुड़ बोबो, तीखुर बर्फी और भेंडा चटनी ने लोगों को बस्तर के असली स्वाद से रूबरू कराया।
वनौषधियों और पारंपरिक चिकित्सा का भी प्रदर्शन
मेले में स्वास्थ्य और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को भी विशेष स्थान दिया गया। हड़जोड़, देव सन्ड, कामराज, काली धतूरा और कोचेल छाली जैसी वनौषधियों के माध्यम से लोगों को उनके औषधीय महत्व की जानकारी दी गई।
मांझीपाल के महादेव नाग, ढोडरेपाल से कंवल सिंह व लखबंधु, दरभा की अमृता व कुंती तथा कावारास के चुनेश कश्यप सहित अनेक लोगों ने औषधीय पौधों का प्रदर्शन कर आयोजन को सफल बनाया।
👉 The Eagle 🦅 Eye 👁️ News
संपादक: Om Sahu
संपर्क: 9926750985
हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें:
👉 The Eagle Eye News WhatsApp Channel

Leave a Reply