लोक कला की मिसाल: छोटे आरापुर के 60 वर्षीय चमरा, बांस की लकड़ी पर नचाते हैं पुतली

बांस पर थिरकती पुतली और चेहरों पर मुस्कान, ‘बस्तर पंडुम’ में बिखेरा लोक कला का जादू

जगदलपुर, 16 जनवरी 2026/ आधुनिकता के इस दौर में, जहां मनोरंजन मोबाइल स्क्रीन तक सिमट कर रह गया है, वहीं तोकापाल ब्लॉक के छोटे आरापुर निवासी 60 वर्षीय चमरा बघेल अपनी अनोखी ‘पुतली कला’ के माध्यम से लोक संस्कृति की लौ को आज भी जीवंत रखे हुए हैं।

चमरा बघेल केवल पुतलियों को नचाते नहीं, बल्कि अपनी खुशमिजाज अदाओं और सादगी भरे व्यवहार से दर्शकों के दिलों में खास जगह बना लेते हैं। उनकी कला बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को समान रूप से आकर्षित करती है।

उनकी प्रस्तुति की सबसे खास बात यह है कि वे पुतली को बांस की लकड़ी पर बांधकर बेहद कुशलता से नचाते हैं। उंगलियों के हल्के इशारों पर जब पुतली थिरकती है, तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

चमरा बघेल का मानना है कि कला का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को स्वस्थ और संस्कारित आनंद देना है। वे कहते हैं— “लोगों की मुस्कान ही मेरी सबसे बड़ी कमाई है।”

लोक पर्व ‘छेर-छेरा’ के अवसर पर उनकी सक्रियता और भी बढ़ जाती है। वे अपनी पुतलियों के साथ आसपास के गांवों का दौरा करते हैं। गांववासी उनकी कला से प्रसन्न होकर उन्हें दान और उपहार देकर सम्मानित करते हैं।

60 वर्ष की उम्र में भी चमरा बघेल का उत्साह, ऊर्जा और जीवंतता युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। वे यह संदेश देते हैं कि उम्र कभी भी कला और जुनून की राह में बाधा नहीं बनती।

हाल ही में छोटे आरापुर में आयोजित प्रतिष्ठित ‘बस्तर पंडुम’ कार्यक्रम में चमरा बघेल ने अपनी पुतली कला का शानदार प्रदर्शन किया। बड़ी संख्या में मौजूद दर्शकों ने तालियों की गूंज के साथ उनकी प्रस्तुति की सराहना की।

चमरा बघेल जैसे लोक कलाकार यह साबित करते हैं कि असली खुशी और पहचान अपनी जड़ों, परंपराओं और संस्कृति से जुड़े रहने में ही है।


रिपोर्ट: ओम साहू
संपादक – The Eagle 🦅 Eye 👁️ News
संपर्क: 9926750985

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