जगदलपुर में धूमधाम से मनाया गया विश्व आदिवासी दिवस, बस्तर की संस्कृति और मूलनिवासी परंपराओं की दिखी भव्य झलक

जगदलपुर। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर जगदलपुर शहर में मूलनिवासी समाज द्वारा बड़े उत्साह और धूमधाम के साथ विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस दौरान शहर के चौक-चौराहों पर बस्तर की समृद्ध आदिवासी संस्कृति, कला, परंपरा, प्राकृतिक जीवनशैली और पारंपरिक वेशभूषा की मनमोहक झलक देखने को मिली।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में मूलनिवासी समाज के लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए और अपनी संस्कृति एवं पहचान को गर्व के साथ प्रस्तुत किया। बस्तर की संस्कृति सदियों से प्रकृति, जल, जंगल और जमीन से गहराई से जुड़ी रही है। यहां की लोककला, लोकगीत, नृत्य, पारंपरिक वाद्य यंत्र, वेशभूषा और जीवनशैली आज भी प्रकृति के साथ सामंजस्य का संदेश देती है।

सतीश वानखड़े ने कार्यक्रम में शामिल होकर दिया समर्थन

इस अवसर पर अखिल भारतीय परिसंघ, जिला बस्तर के जिला अध्यक्ष सतीश वानखड़े भी कार्यक्रम में सम्मिलित हुए और मूलनिवासी समाज के आयोजन को अपना समर्थन दिया।

“बस्तर की पहचान केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता से नहीं, बल्कि यहां के मूलनिवासी समाज की संस्कृति, परंपराओं और प्रकृति के प्रति गहरे जुड़ाव से भी है। हमारी संस्कृति हमारी पहचान और हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए अनमोल विरासत है।”— सतीश वानखड़े, जिला अध्यक्ष, अखिल भारतीय परिसंघ, जिला बस्तर

उन्होंने कहा कि जल, जंगल और जमीन केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि मूलनिवासी समाज के जीवन, संस्कृति और अस्तित्व का आधार हैं। इसलिए प्रकृति का संरक्षण करना और आने वाली पीढ़ियों को इसके महत्व के बारे में जागरूक करना हम सभी की जिम्मेदारी है।

बांस और प्राकृतिक सामग्री से सजे चौक-चौराहे बने आकर्षण का केंद्र

जगदलपुर के चौक-चौराहों सहित विभिन्न स्थानों को बांस, पत्तों और अन्य प्राकृतिक सामग्री से आकर्षक एवं पारंपरिक तरीके से सजाया गया। इन सजावटों के माध्यम से बस्तर की प्राकृतिक जीवनशैली और मूलनिवासी संस्कृति को खूबसूरती से प्रदर्शित किया गया।

बांस और प्राकृतिक सामग्री से की गई यह सजावट लोगों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रही। शहर से गुजरने वाले लोगों ने रुककर सजावट को देखा और बस्तर की संस्कृति को दर्शाने वाली इस पहल की जमकर सराहना की। इस प्रयास ने यह भी संदेश दिया कि आधुनिकता के दौर में भी अपनी पारंपरिक कला और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके संस्कृति को जीवंत रखा जा सकता है।

नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ना जरूरी

अखिल भारतीय परिसंघ जिला बस्तर के जिला अध्यक्ष सतीश वानखड़े ने कहा कि आज की नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, इतिहास, संस्कृति और परंपराओं से जोड़ना बेहद जरूरी है। जब बच्चे और युवा अपनी संस्कृति को समझेंगे और उस पर गर्व करेंगे, तभी हमारी समृद्ध विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकेगी।

विश्व आदिवासी दिवस केवल उत्सव मनाने का दिन नहीं, बल्कि मूलनिवासी समाज के अधिकारों, सम्मान, संस्कृति, परंपराओं और प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूक होने का अवसर भी है। बस्तर की संस्कृति हमें प्रकृति के साथ मिल-जुलकर जीवन जीने और प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान करने की प्रेरणा देती है।

संस्कृति और प्रकृति संरक्षण का दिया संदेश

कार्यक्रम के माध्यम से समाज को यह संदेश दिया गया कि अपनी संस्कृति को बचाएं, अपनी परंपराओं को आगे बढ़ाएं, नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ें और जल-जंगल-जमीन एवं प्रकृति की रक्षा के लिए हमेशा सजग रहें।

विश्व आदिवासी दिवस पर सभी मूलनिवासी समाज एवं बस्तरवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बहुत-बहुत बधाई।

जय भीम।
जय संविधान।
जय मूलनिवासी।


रिपोर्ट: ओम साहू


Posted

in

by

Tags:

Comments

Leave a Reply