बस्तर दशहरा में नहीं गूंजेगा मुंडा बाजा? 30 वादकों ने किया बहिष्कार का ऐलान, 6 साल से मानदेय नहीं मिलने का आरोप

मुण्डा बाजा वादक

जगदलपुर। बस्तर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान बस्तर दशहरा में इस बार मुंडा बाजा की पारंपरिक धुन सुनाई देने पर संकट खड़ा हो गया है। पिछले छह वर्षों से मानदेय नहीं मिलने का आरोप लगाते हुए करीब 30 मुंडा बाजा वादकों ने इस बार दशहरा में शामिल नहीं होने का निर्णय लिया है। वादकों का कहना है कि जब तक प्रशासन की ओर से लिखित आश्वासन नहीं दिया जाएगा, तब तक वे आयोजन में अपनी भागीदारी नहीं निभाएंगे।

एक महीने पहले दिया आवेदन, जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं करने का आरोप

मुंडा बाजा वादकों के अनुसार, उन्होंने अपनी मांगों को लेकर लगभग एक महीने पहले बस्तर महाराजा कमलचंद्र भंजदेव, बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष एवं सांसद महेश कश्यप, बस्तर कलेक्टर और जगदलपुर तहसीलदार को लिखित आवेदन सौंपा था। इसके बावजूद अब तक कोई ठोस पहल नहीं होने से वादकों में नाराजगी है।

2019 की घोषणा के बाद भी छह साल से मानदेय का इंतजार

वादकों का आरोप है कि वर्ष 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा मांझी, मेम्बरिन और मुंडा बाजा वादकों को प्रतिमाह 2,000 रुपये मानदेय देने की घोषणा की गई थी। उनका कहना है कि छह वर्ष बीत जाने के बाद भी उन्हें इस घोषणा का लाभ नहीं मिला है। वहीं, अन्य संबंधित वर्गों को मानदेय मिलने की बात कहते हुए उन्होंने अपने साथ भेदभाव होने की आशंका जताई है।

लिखित आश्वासन के बिना दशहरा में शामिल नहीं होंगे वादक

वादकों ने स्पष्ट किया है कि वे बस्तर दशहरा की परंपरा और अपनी सांस्कृतिक जिम्मेदारी को समझते हैं, लेकिन वर्षों से लंबित मांग को लेकर अब केवल मौखिक आश्वासन पर भरोसा नहीं करेंगे। उनका कहना है कि प्रशासन लिखित आश्वासन देता है, तभी वे दशहरा में शामिल होने पर विचार करेंगे।

मनाने पहुंचे SDM और RI, फैसले पर अडिग रहे वादक

मुंडा बाजा वादकों को मनाने के लिए एसडीएम और आरआई भी पहुंचे। अधिकारियों ने उन्हें समझाने का प्रयास किया, लेकिन वादक अपनी मांग पर अडिग रहे। उन्होंने दोहराया कि छह वर्षों से लंबित मानदेय के संबंध में लिखित आश्वासन मिलने के बाद ही वे बस्तर दशहरा में शामिल होंगे।

बस्तर की सांस्कृतिक परंपरा पर खड़ा हुआ सवाल

बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं का प्रतीक है। ऐसे में 30 पारंपरिक मुंडा बाजा वादकों का आयोजन से दूरी बनाने का निर्णय महत्वपूर्ण हो गया है। अब सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन और बस्तर दशहरा समिति उनकी मांगों पर ठोस निर्णय लेकर उन्हें आयोजन में शामिल कर पाएगी?

अब देखना होगा कि प्रशासन लिखित आश्वासन देकर इस सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े विवाद का समाधान निकालता है या बस्तर दशहरा में इस बार मुंडा बाजा की पारंपरिक धुन नहीं सुनाई देगी।


रिपोर्ट: ओम साहू
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