

पूर्व शहर कांग्रेस अध्यक्ष मनोहर लुनिया सहित चारों आरोपितों की अपील खारिज, दो-दो साल की सश्रम कैद की सजा पर अदालत ने लगाई मुहर
जगदलपुर, 17 अक्टूबर। करीब चार दशक पहले पंजीकृत विक्रय पत्र के जरिए बेची जा चुकी जमीन को दोबारा बेचने के मामले में प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश, बस्तर सिद्धार्थ अग्रवाल की अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने पटवारी नरेंद्र कुमार सोनी सहित चार आरोपितों की दोषसिद्धि और दो-दो वर्ष के सश्रम कारावास की सजा बरकरार रखते हुए उनकी दोनों दांडिक अपीलें खारिज कर दी हैं। आरोपितों में जगदलपुर के कारोबारी एवं पूर्व शहर कांग्रेस अध्यक्ष मनोहर लुनिया भी शामिल हैं।
1984 में खरीदी गई थी जमीन
प्रकरण के अनुसार, वंदिता पटनायक के पिता बी. राधाकृष्णन ने 27 अगस्त 1984 को जगदलपुर देहात के पटवारी हल्का नंबर 100 स्थित खसरा नंबर 89/10 की 4,800 वर्गफीट जमीन लुनिया परिवार से पंजीकृत विक्रय पत्र के माध्यम से खरीदी थी। नामांतरण एवं बटांकन के बाद जमीन का नया खसरा नंबर 89/41 आवंटित हुआ और राजस्व अभिलेखों में उनका नाम दर्ज हो गया।
मकान बनाने पहुंचीं तो सामने आया दोबारा बिक्री का मामला
मई 2009 में वंदिता पटनायक अपने पति के साथ उक्त भूखंड पर मकान निर्माण कराने पहुंचीं, लेकिन वहां दूसरे लोगों द्वारा निर्माण कार्य कराया जा रहा था। इसके बाद जमीन का सीमांकन कराया गया, जिसमें जमीन की दोबारा बिक्री का मामला सामने आया। इस संबंध में वर्ष 2010 में कोतवाली थाने में अपराध दर्ज कराया गया।
2018 में सुनाई गई थी दो-दो साल की सजा
विचारण न्यायालय ने 22 सितंबर 2018 को पटवारी नरेंद्र कुमार सोनी और मनोहर लुनिया, मूलचंद्र लुनिया तथा बीरचंद्र लुनिया को धोखाधड़ी एवं आपराधिक षड्यंत्र के आरोप में दोषी ठहराते हुए दो-दो वर्ष के सश्रम कारावास और 100-100 रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई थी। हालांकि, कूटरचना से संबंधित अन्य धाराओं में उन्हें दोषमुक्त किया गया था।
अपील में भी नहीं मिली राहत
दांडिक अपील की सुनवाई के दौरान सत्र न्यायालय ने दस्तावेजों और गवाहों के बयानों का परीक्षण किया। अदालत ने जमीन की दोबारा बिक्री के तथ्य को स्वीकार करते हुए दस्तावेजों के सत्यापन में उचित सतर्कता नहीं बरतने संबंधी दलील को राहत का आधार नहीं माना। 16 अक्टूबर को पारित संयुक्त फैसले में न्यायालय ने दोनों अपीलें खारिज करते हुए पूर्व में सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा।
इस फैसले को जमीन की खरीद-बिक्री में दस्तावेजों की प्रामाणिकता और राजस्व अभिलेखों की शुद्धता के महत्व से जोड़कर देखा जा रहा है।

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