फूल-माला बेचने वाले ग्रामीणों पर नगर निगम की कार्रवाई से उबाल, आदिवासी समाज और ग्रामीणों में आक्रोश

भारी आक्रोश इनकी दुकानदारी पर पड़ेगा असर

‘बाहरी भगाओ, बस्तरिया बचाओ’ के नारे के साथ क्रांति सेना ने उठाई स्थानीय लोगों के व्यापारिक अधिकारों की मांग, दीपावली पर ग्रामीणों को बाजार में जगह देने की अपील

जगदलपुर। दीपावली के त्योहार से पहले जगदलपुर के संजय मार्केट, सिरहासार चौक और गोल बाजार क्षेत्र में फूल-माला एवं पूजा सामग्री बेचने पहुंचे ग्रामीणों पर नगर निगम की कार्रवाई को लेकर विवाद गहराता नजर आ रहा है। वर्षों से दीपावली के अवसर पर अस्थायी दुकान लगाकर अपनी आजीविका चलाने वाले ग्रामीण विक्रेताओं के समर्थन में अब स्थानीय आदिवासी समाज और ग्रामीणों की आवाज उठने लगी है।

इस मुद्दे को लेकर क्रांति सेना की ओर से भी स्थानीय लोगों के व्यापारिक अधिकारों का सवाल उठाया जा रहा है। संगठन की मांग है कि बस्तर के ग्रामीणों को अपने ही शहर के बाजारों में पारंपरिक उत्पाद बेचने का अवसर और सम्मान मिलना चाहिए। इसी बीच ‘बाहरी भगाओ, बस्तरिया बचाओ’ और ‘ये आग है आग, भाग परदेसिया भाग’ जैसे नारों ने इस मुद्दे को और चर्चा में ला दिया है।

तीन दिन के अस्थायी बाजार पर आखिर आपत्ति क्यों?

दीपावली केवल रोशनी और खुशियों का त्योहार नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे और सहयोग का पर्व भी है। बस्तर के दूरस्थ गांवों से ग्रामीण हर साल फूल-माला और पूजा सामग्री लेकर जगदलपुर पहुंचते हैं। संजय मार्केट, सिरहासार चौक और गोल बाजार जैसे स्थानों पर तीन दिनों के लिए अस्थायी दुकानें लगाकर वे अपने परिवार की आजीविका के लिए कुछ अतिरिक्त आमदनी जुटाते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि यह कोई नई परंपरा नहीं है। वर्षों से वे दीपावली के अवसर पर अपने उत्पाद बेचते आ रहे हैं। ऐसे में उनके रोजगार पर कार्रवाई करना उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा करने जैसा है।

बड़े व्यापारियों के साथ छोटे ग्रामीण विक्रेताओं को भी मिले जगह

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब दीपावली बड़े व्यापारियों के लिए कारोबार बढ़ाने का अवसर है, तो गरीब ग्रामीणों को अपनी छोटी-सी दुकान लगाने का अवसर क्यों नहीं मिलना चाहिए?

ग्रामीणों के पास न बड़े शोरूम हैं और न ही स्थायी व्यावसायिक प्रतिष्ठान। वे अपने गांवों से स्थानीय उत्पाद लाकर कुछ दिनों के लिए बाजार में बेचते हैं। ऐसे में प्रशासन को उनकी आजीविका का ध्यान रखते हुए मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

यातायात व्यवस्था के नाम पर रोजगार प्रभावित करना उचित नहीं

बाजार में भीड़ और यातायात की समस्या से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इसका समाधान ग्रामीणों को बाजार से हटाना नहीं, बल्कि उनके लिए व्यवस्थित स्थान निर्धारित करना होना चाहिए।

नगर निगम, जिला प्रशासन और यातायात पुलिस आपसी समन्वय से ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं, जिससे बाजार में अव्यवस्था भी न हो और ग्रामीणों का रोजगार भी प्रभावित न हो।

बस्तर की पहचान गांव और ग्रामीण संस्कृति से

बस्तर की असली पहचान यहां की आदिवासी संस्कृति, परंपराओं, ग्रामीण जीवन और आपसी भाईचारे में है। शहर और गांव एक-दूसरे के पूरक हैं। शहर का बाजार ग्रामीण उत्पादों से जुड़ा है और ग्रामीणों की आजीविका भी शहर के बाजारों पर निर्भर करती है।

ऐसे में ग्रामीणों और शहरी व्यापारियों के बीच टकराव की स्थिति पैदा होने के बजाय आपसी सहयोग और समन्वय को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

दीपावली सबकी है, खुशियां सबकी हैं और सम्मान के साथ आजीविका कमाने का अधिकार भी सबका है। प्रशासन को चाहिए कि वह ग्रामीण फूल-माला विक्रेताओं के लिए निर्धारित स्थान उपलब्ध कराए, ताकि किसी गरीब ग्रामीण के घर का दीपक उसकी रोजी-रोटी छिनने से बुझने न पाए।

सवाल सीधा है—क्या बस्तर के ग्रामीणों को अपने ही शहर में त्योहार के तीन दिन मेहनत करके कमाने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए?


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